मानव
हिन्दू धर्म के अनुसार महा-माया के तीन पुत्र ब्रम्हा, विष्णु एवं शिव तथा इनकी धर्म-पत्नी क्रमश सरस्वती, लक्ष्मी एवं पार्वती का वर्णन मिलता है किन्तु वास्तव में मानव को कर्म का ज्ञान देने के उद्देश्य से यह तीनों देवी-देवता एक ही दम्पति(स्त्री-पुरुष) के जीवन में आयु, रूप एवं कर्म का वर्णन है तथा विश्व का कोई भी व्यक्ति अपने आयु, रूप एवं कर्म के अनुसार बाल-अवस्था(कलयुग) में हनुमान के रूप में शूद्र का कार्य करते है, युवा अवस्था(द्वापर-युग) में कृष्ण-राधा के रूप में वैश्य का कार्य करते है, वयस्क अवस्था(त्रेता-युग) में ब्रम्हा-सरस्वती एवं राम-सीता के रूप में क्षत्रिय का कार्य करते है तथा वृद्ध अवस्था(सत्य-युग) में शिव-पार्वती के रूप में ब्राम्हण का कार्य करते है।
कल-युग
जब किसी व्यक्ति का जन्म होता है तो वह व्यक्ति सर्वप्रथम कलयुग में निवास करते है तथा किसी भी बच्चें को बंदर अथवा हनुमान का रूप कहते है तथा हनुमान(बच्चों) को शिव-पार्वती(दादा-दादी) का रूप अथवा अवतार कहते है तथा कोई भी व्यक्ति बाल-अवस्था में अपने माता-पिता(सीता-राम) या अभिभावक(जो पालन करते है) की निस्वार्थ भाव से शूद्र(नौकर या दास) के रूप में सेवा या कार्य करके अपने शूद्र धर्म का पालन करते है।
द्वापर-युग
जब कोई व्यक्ति कलयुग से द्वापर युग में पहुँचते है अर्थात बाल अवस्था से युवा अवस्था में जाते है तो कृष्ण के रूप में स्वयं विष्णु का अवतार होते है तथा कृष्ण की तरह गोपियों के संग क्रीड़ा करना तथा कंश(राजा अथवा चोर) जो उसके घर से दूध/दही/घी/माखन अर्थात घन की चोरी(टैक्स के रूप में) करता है ऐसे कंश(राजा अथवा चोर) का विनाश करना तथा अपने मित्र एवं गोपियों की रक्षा करना एवं कालिया-नाग के विष से यमुना नदी के जल को साफ़ करना स्वयं कृष्ण का कार्य है तथा कृष्ण मुख्य रूप से दूध का व्यवसाय करके अपने वैश्य धर्म का पालन करते है।
त्रेता-युग
जब कोई व्यक्ति द्वापर-युग से त्रेता-युग में पहुँचते है अर्थात युवा से वयस्क होते है अर्थात कोई भी व्यक्ति विवाह हो जाने के बाद राम के रूप में स्वयं विष्णु का अवतार होते है तथा एक दम्पति सीता एवं राम के साथ ब्रम्हा एवं सरस्वती के भी अवतार होते है, जब एक दंपत्ति अपने बच्चें को जन्म देते है तो पिता ब्रम्हा के रूप में अपने बच्चे का भविष्य निर्धारित करते है एवं एक माता सरस्वती के रूप है अपने बच्चे को बोलना, चलना, लिखना, पढ़ना इत्यादि सिखाती है तथा राम के रूप में अपने परिवार एवं बच्चों की सुरक्षा एवं पालन-पोषण करके अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करते है।
सत्य-युग
किसी भी अविवाहित व्यक्ति या जिसकी अपनी संतान नहीं हो उसके लिए सत्य-युग में पहुंचना असंभव है अतः जब कोई दंपत्ति जिनकी अपनी संतान हो और वह त्रेता-युग से सत्य-युग में पहुँचते है तो वह अपना सबकुछ अर्जित किया हुआ ज्ञान एवं धन-संपत्ति अपने बच्चों को दान कर देते है तथा दान करने वाले माता-पिता स्वयं शिव एवं पार्वती का रूप होते है तथा दानी से बड़ा कोई ज्ञानी नहीं है और जो अपना सबकुछ अपने बच्चों को दान करके स्वयं अपने बच्चों से भिक्षा मांगकर खाते है वह अपने ब्राम्हण धर्म का पालन करते है।